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नारी का उत्थान- इक़रा असद


मैं इक़रा असद आज बात कर रही हूँ उन लोगों की जो औरतों की इज़्ज़त करना अपनी तौहीन समझते हैं। क्यूंकि अपने मयार(level) से गिर कर बात करना आज कल फैशन बन गया है, मेरी यह बात सामाजिक और राजनीतिक दोनों स्तर पर सटीक बैठती है, लेकिन मैं बात कर रही हूँ 'आलोचना' की जो आजकल हर धर्म, हर वर्ग, हर समाज में देखने को मिल रही है।


"आलोचना" महिलाओं की!! फिर चाहे वह कितनी ही बुद्धिजीवी महिला क़्युं न हो लेकिन इस पुरुष प्रधान समाज में महिला केवल चार दीवारी में रहने वाला एक ऐसा प्राणी है जिसको समय रहते पुरुष केवल अपने उपभोग की वस्तु मात्र समझता है, समझे भी क़्युं न आखिर प्रकृति का नियम ही निचली मानसिकता रखने वालों पर कुछ इस क़दर हावी है के बस क्या कहिये।


आलोचना जब अदब के दायरे से निकलकर आपत्तिजनक भाषा में होने लग जाये तो उससे कुछ हासिल नहीं हो सकता सिवाय बदगुमानी और तनाव के और फिर ये चिंता का विषय बनते देर नहीं लगता। हमारा समाज इस बात को बड़ी अचरज के साथ देखता है के चार दीवारी में रहने वाली महिला इल्म हासिल करके बाहरी मुआशरे में अपनी राय या अपना नजरिया बेबाक तरीके से कैसे रख सकती है!!...


ये मेरा स्वयं का अनुभव है कि लोग हमेशा खासतौर से उन महिलाओं से ख़ार खाते हैं जो सवाल पूछती हैं या किसी विषय पर टिप्पणी देती हैं। क्युंकी लोग दूसरों की सुनना नहीं चाहते बल्कि अपनी बात दूसरे के मुंह में ठूंस के उसे सुनने के लिए आतुर रहते है। लेकिन इसके विपरीत यदि वह ऐसा न करे तो उसके ऊपर चरित्रहीन होने का लांछन लगाना सबसे आसान हथकंडा है अपना पुरुषार्थ दर्शाने का।

अधिकतर देखा गया है कि महिला सशक्तिकरण पर जो पुरुष गला फाड़ते हैं कहीं न कहीं वही पुरुष अपनी मित्र मंडली में बैठ के कहकहे लगाते हुए माँ-बहन की गाली के उदघोष से अपनी हास्यास्पद बात शुरू करते होते हैं या क्रोध में अपनी मां-बहनों को भूल दूसरों की मां-बहनों को भरपूर गलियां दे रहे होते हैं। ऐसी दोहरी मानसिकता रखने वाले लोगों को एक औरत की सफलता गले नहीं उतरती जो बेहत अफ़सोस जनक और शर्म नाक है, मैं उन पुरुषों से कहना चाहूंगी कि नारी को अपने समान न देख पाने के कारण उनका सम्मान न करना नपुंसकता का परिचय है, और एक नपुंसक समाज के दृष्टिकोण को सुधारने के लिए उद्दंड, स्वच्छंद एवं वात्सल्य से भरपूर मैं हूँ आज की नारी और अगले जन्म भी मैं "इक़रा असद" ही बनना चाहूँगी।


 

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