Image by Leo Chane

मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं, अपितु उसका निर्माता है, परिवर्तक है।


आप सभी जो इस वक्त इस संपादन को पढ़ रहे है, खासकर कि मेरे नौजवान भाई-बहन जो जीवन में ऊँची छलाँग लगाना चाहते है, आपने ये ज़रूर अनुभव किया होगा की कई बार लोग आपके मनोबल को गिराने के लिए ये कहते हैं कि, "मनुष्य परिस्थितियों का दास है!" अर्थात मनुष्य के पास परिस्थितियों के आगे समर्पण करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं होता, और वह परिस्थितियों की प्रबलता के आगे नहीं टिक सकता। खास तौर से मैंने देखा है कि ऐसी बातें अक्सर हमारे बड़े-बुजुर्गों की और से आती हैं। और कमाल की बात यह है की ऐसे लोग इसे अपने जीवन के तजुर्बों से मिली सीख़ बताते हैं। दुर्भाग्यवश, जो नौजवान इसे जीवन का सच मान लेते हैं, वे अपनी छमताओं को सीमित बना लेते है और इसी भ्रम में जीने लगते है कि परिस्थितियाँ ही उनके जीवन की दिशा निर्धारित करतीं हैं।

मेरा संशय यहाँ किसी को आहत करने का नहीं है परन्तु, ऐसे तजुर्बे से सिखने का क्या फ़ायदा जो उस व्यक्ति के ही काम न आया हो, जिसने उसे परिस्थितियों को चुनैती देना ही न सिखाया हो। अगर आप इस बात पर चिंतन करे तो ये एक सच है कि आम तौर पे जो लोग ऐसी बातें करते है उन्होंने अपने जीवन में कोई ख़ास प्रशंशनीय कार्य नहीं किया होता। मैं यहाँ फिर से साफ़ कर देना चाहता हूँ की मेरा मंतव्य किसी को जज करने या निचा दिखने का नहीं है। पर ये समाज की सचाई है की हमारे चारो ओर अधिक मात्रा में असफल और सामान्य लोग रहते है, जिसे अंग्रेजी में आप एट्टी परसेंट कॉमन पीपल भी कहते हैं। जो सामान्य है और जिन्होंने जीवन में कभी कोई रिस्क नहीं लिया, और अधिकांश जीवन इसी पूर्वाग्रह में व्यतीत कर दिया कि वे परिस्थितियों के आगे कुछ नहीं कर सकते, और जीवन कि सामान्यता को स्वीकारने के अलावा उनके पास और कोई उपाय नहीं है। और ऐसे लोगों को दूसरों को आगे बढ़ता देखने में भी बहुत समस्या होती है, क्यूँकि ये मामूली (मीडियाकर) से आगे सोच ही नहीं सकते।

अब ऐसे लोगों को यदि आप अपने बड़े-बड़े सपनो के बारे में बताएँगे तो आप उनसे कैसे जवाब कि अपेक्षा करते हैं। वे आपको वही बताते हैं जो उन्होंने अपने जीवन में अनुभव किया है- चुनैतियों का सामना करने के बजाए उनसे दूर भागना और ये स्वीकार लेना कि वह लक्ष्य उनके जैसे लोगो के लिए बना ही नहीं है। मैं यहाँ आपको एक सज्जन के बारे में बताना चाहूँगा जिनके ख्याल बिलकुल ऐसे ही थे। उनकी गरिमा रखने के लिए मैं यहाँ उनका नाम तो नहीं लूंगा, पर हाँ, उनके उद्धरण को ज़रूर प्रस्तुतु करना चाहुगा। इन सज्जन ने अपने जीवन में तो कोई ख़ास कमल नहीं किया था, पर आश्चर्य यह था, कि वे अपने आस-पास के लोगों को भी आगे बढ़ता नहीं देख सकते थे। जब भी कोई उनसे सफलता से जुडी बातें करता तो वह इतना चीड़ जाते कि, सफलता को ही पूर्ण रूप से एक भ्रम बताना शुरू कर देते थे। उनके अनुसार प्रत्येक सफल व्यक्ति किस्मत के बल पर ही वहाँ तक पहुंच पाया है, द्रिढ़ संकल्प, बड़े स्वप्न और कर्म कि शक्ति से नहीं। अपने चरों ओर ऊँचे स्वप्न देखने वाले का मनोबल वह इतनी बुरी तरह गिरा देते थे, कि वह दोबारा जीवन में कुछ असाधारण करने का विचार ही सदा के लिए त्याग दे। उस समय मुझे ये समज आया कि ऐसे लोग हमारे युवा के मनोबल को कितना छतिग्रस्त करते हैं। और सबसे दुर्भाग्य कि बात तो यह है कि ऐसे लोग अधिकतर हमारे निकटतम सम्बन्धी होतें हैं, जिन्हे अनदेखा/ अनसुना करना संभव नहीं होता। इसीलिए मेरे सारे युवा मित्रों, मैं आपको ऐसे लोगों से सावधान रहने कि सलाह देता हूँ, और ये चेतता हु कि कभी भी किसी के भी अनुभव पर भरोसा करने से पहले ये ज़रूर परखे कि आखिर यह अनुभव/ सलाह उसके जीवन में कितनी काम आया/ आई।

आपको सदा स्वयं को ऐसे लोगों के किस्से-कहानियों और जीवन-गाथा से घिरा रखना चाहिए जिन्होंने जीवन के बहाव के विरुद्ध जाके अपने सपनो को वास्तिविकता में परिवर्तिति किया। मेरे कुछ युवा मित्र मुझसे हमेशा यह पूछते हैं कि हम खुद को दूसरों कि नेगेटिविटी/ टॉक्सिसिटी से कैसे दूर रख्खें और इतने सारे डिमोटीवेटिंग लोगो के बीच रहते हुए कूद को अपने लक्ष्य के प्रति ऊर्जावान कैसे रखें? तो इसका सीधा सा जवाब है अपने मन को इतनी सारी प्रेरणा देना कि ऐसे लोगो कि कड़वी बातें आपको प्रभावित ही न करें। आपको किसी ऐसे महान व्यक्ति के अनुभव को पढ़ना चाहिए जिसने परिस्थितियों को कभी खुद से अधिक बलवान नहीं समझा। ऐसी हस्तियों के फूटस्टेप्स फॉलो करना चाहिए जिन्होंने खुद को साबित करने के लिए नहीं बल्कि अपने सपनो को साकार करने के लिए निरंतर कर्म किया। इन्होने कभी लोगों कि बातों को अपने पथ की बाधा नहीं बनने दिया। जाहिर सी बात है की ऐसा करने से इनकी मुश्किलें कोई खास काम नहीं हुई, पर ऐसा करके ये एक व्यर्थ के तनाव से बच गए। आगे मैं आपको एक ऐसी ही वीरांगना कि कहानी सुनाना चाहूँगा जिसने ये सिद्ध कर दिया की मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं बल्कि उसका निर्माता है।

तो मैं आज आपका परिचय करना चाहता हु 'अरुणिमा सिन्हा' से, तीस साल कि हमारे-आपके ही जैसी एक ऐसी महिला जिसे कुदरत ने एक ऐसी आग कि बट्टी में झोक दिया था, जिसकी कल्पना करना भी मुमकिन नहीं है। लखनऊ के एक आर्मी परिवार में जन्मी अरुणिमा हमेशा से जीवन में कुछ असाधारण करना चाहती थीं। बचपन से ही उनका सपना पैरामिलिटरी फोर्सेज में जाकर देश कि सेवा करने का था। उनके प्रयास सफल होते भी दिख रहे थे और उन्हें सी.आर.पी.ऑफ़ से कॉल भी आया था। अपने सपनो को साकार करने और परीक्षा देने के लिए अरुणिमा लखनऊ से दिल्ली की ट्रैन पे सवार भी हो गयीं। पर किसको पता था की अरुणिमा के ऊपर एक ऐसी विपदा आने वाली है जिसकी कल्पना उन्होंने अपनी भयानक से भयानक स्वप्न में भी नहीं कि होगी। कुछ बदमाशों ने ट्रैन में उनसे उनका पर्स छीनने के कोशिश की और उन्हें तेज़ी से चलती ट्रैन से निचे फेंक दिया। इस हादसे में अरुणिमा का एक पैर ट्रैन के नीचे आ गया और उनका जीवन हमेशा के लिए बदल गया।

हादसे के बाद अरुणिमा का इलाज़ एम्स अस्पताल में चलने लगा। पैरामिलिटरी ज्वाइन करने का जज़्बा रखने वाली लड़की कि दयनीय शारीरिक स्थिति तो सबको दिख रही थी, पर लोगों को इस बात का कोई अनुमान नहीं था कि अरुणिमा के मन के भीतर क्या चल रहा था। अपने आप को इस लाचार स्थिति में देखना अरुणिमा को मंज़ूर नहीं था। विश्वास करना मुश्किल है पर अरुणिमा ने अस्पताल में ही कुछ असाधारण कारने का थान लिया था। उन्होंने ये निश्चित कर लिया की वे अपने इसी विकलांग पैर से दुनिया कि सबसे ऊँची छोटी पर अपना परचम लेहराएँगी। जिसको भी उनके इस निश्चय के बारे में पता चलता वो अपने कानों पर भरोसा न कर पा रहा था। लेकिन अरुणिमा पर तो जैसे खुद को साबित करना का जूनून सवार हो गया था। उनसे अपनी ओर आती हर चुनौती को एक धूल चाटने का एक अचूक निश्चय कर लिया था। किसी को अंदाज़ा भी नहीं था कि इन दिनों अरुणिमा कितनीं शारीरिक और मानसिक पीड़ा से गुजर रही थी, पर उनसे स्वयं को इस आग की भट्टी में झोक दिया।

वो कहते हैं न कि, "खुदी को कर बुलंद इतना, कि हर तकदीर से पहले, खुदा खुद बन्दे से पूछे बता तेरी रज़ा क्या है!" और एक लम्बी अग्निपरीक्षा के बाद आखिरकार वो अवसर आया जिसका अरुणिमा के साथ-साथ सभी को बेसब्री से इंतज़ार था। २१ मई २०१३ को अरुणिमा ने वो कर दिखाया जो किसी चमत्कार से कम न था, दुनिया के सबसे ऊँचे शिखर, माउंट एवेरेस्ट पर अरुणिमा ने भारत का झंडा लहराया और बन गयीं दुनिया कि पहली दिव्यांग महिला जिसने एक आर्टिफीसियल लेग के साथ ये मुकाम हासिल किया। इतने सालों बाद भी अरुणिमा के हौसले को देख कर दिग्गज हस्तियाँ उन्हें अपनी प्रेरणा के रूप में देखते हैं। अब मैं आपको वर्त्तमान में वापस लाना चाहूँगा और पूछना चाहूँगा कि क्या अब भी आप अपने इर्द-गिर्द के नेगेटिव लोगों कि परवाह करते हैं। शायद नहीं, क्यूँकि अब आपको पता है कि आपके विशाल सपने के आगे ये सब व्यर्थ हैं।

"मेरी प्रिय युवा दोस्तों, अपनी कलम को विराम देते-देते मैं यही कहना चाहूँगा कि अपने जीवन कि परिस्थितियों को खुद पे हावी न होने दे, और सदैव याद रखे कि आप परिस्थितियों के दास नहीं बल्कि उसके निर्माता और परिवर्तक हैं।"

-श्रेयश शर्मा

 

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