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मेरे प्रिय अभिभावकों!


मेरे प्रिय अभिभावकों! मैं जानता हु कि आप सभी अपनी संतानों के प्रति कितने समर्पित है। और उनकी उन्नति के स्वप्न को पूरा करने के लिए आप हर संभव प्रयास कर रहे है। ज़ाहिर सी बात है की जब आप अपने बालक की भलाई की ओर समर्पित है, तो उसे भी आपके प्रयासों को यथार्त में परिवर्तिति करने का हर प्रयास करना चाहिए। जिस प्रकार माँ-बाप अपनी जिम्मेदारियों को पूर्ण रूप से निभा रहे है, उसी प्रकार बच्चो को अपने माँ-बाप की परियोजनाओं को सफल बनाने में कड़ी मेहनत करनी चाहिए। ये तो रही आचरण और किताबों की बातें,और नैतिक रूप से ये सच भी है। लेकिन वास्तिक भूमि पर द्रश्य कुछ और ही है।


मैं चकित नहीं हु ये कहते हुए, की जब मैं अपने चारो ओर अभिभावकों और संतानो के ताल-मेल को देखता हु, तो मुझे कुछ और ही नज़ारा दिखाई देता है। लगभग सभी माँ-बाप और उनके बच्चों के बीच अंडरस्टैंडिंग की काफी कमी है। माँ-बाप जीवन के हर छेत्र में बच्चो को मार्गदर्शित करना चाहते है, और बच्चे अपने जीवन के कुछ पल, कुछ फ़ैसले पूर्णता खुद लेना चाहते है। उन्हें माता-पिता का हर सन्दर्भ में टोकन इर्रिटेट करता है। बैरहाल! मैं यहाँ कौन सही है और कौन गलत, इसकी टिप्पड़ी नहीं करना चाहता। और न ही ये सही होगा। पर मैं आज अपनी कलम से सभी अभिभावकों (माँ-बाप) को परवरिश कि कुछ बारीकियां जरूर बताना चाहुगा।


आगे बढ़ने से पहले, मैं सभी पाठको, ख़ासकर पेरेंट्स से ये निवेदन जरूर करना चाहुगा की वो इस ब्लॉग को ओपन माइंड से पढ़े (पूर्वाग्रह से मुक्त होकर पढ़े)। सबसे पहले तो मैं आपको वो दिन याद दिलाना चाहुगा जब आप खुद अपने बाल्यकाल में पतंग उड़ाया करते थे। याद है कितना खुशहाल अनुभव हुआ करता था वो। पतंग के माधयम से खुद आसमान में उड़ने की कल्पना करना। क्या आनंदमय दिन थे वो भी! पर अब ध्यान से एक बात पे मेरे साथ गौर कीजिये। अपनी पतंग को आकाश में और ऊचा ले जाने के लिए आप क्या तरकीब लगते थे? आखिर ऐसा क्या करते थे जिससे आपकी पतंग आसमान कि उचाईयों तक पहुंच जाए? सोचिये, सोचिये?


सही ज़वाब- आप अपनी पतंग को ढील देते थे। हैना! क्या कभी ऐसा हुआ है की आपकी पतंग आसमान में उचाईयों तक गई हो वो भी बिना ढील दिए। शायद नहीं! क्योकिं ऐसा संभव की नहीं है। एक पतंग ढील दिए बिना आकाश में उचा उड़ी नहीं सकती। अब वर्त्तमान में वापस आके अपने बालक को एक पतंग की भाति मानिये। जिस प्रकार आप अपनी पतंग को आकाश में सबसे ऊपर देखना की चाह रखते थे, उसी प्रकार आप यह भी चाहते ही होंगे कि आपकी संतान सफलता कि सबसे ऊंची सीढ़ी तक पहुंचे। फ़िर आप ये कैसे कल्पना कर सकते हैं कि उसे आगे बढ़ने कि ढील दिए बिना वो आगे बढ़ जाए।

मैंने अक्सर देखा है कि माँ-बाप कभी-कभी अपने बच्चो को लेकर ओवरप्रोटेक्टिव हो जाते है, और उनके जीवन कि बहुत महीन-महीन बातों पे अपना वर्चस्वा पाने की कोशिश करते है। अभिभावकों की दृष्टि से देखें तो ये बिलकुल सही लगता है। लेकिन समझदारी के साथ एक संतान के नजर्ये से देखे तो ये अक्सर उनके लिए घुटन बन जाता है। उद्धारण के तौर पे, बच्चो के, ख़ासकर टीनएजर्स के कुछ व्यग्तिगत पसंद, फैशन सेंस, वगेरा-वगेरा। माँ-बाप कभी-कभी बच्चो को सही दिशा खुद दिखने के प्रयासों में, उन्हें सही दिशा पहचानने में सक्षम नहीं बना पाते। कहते है जीवन में अनुभव ही सबसे बड़ा गुरु/मार्गदर्शक है। परन्तु अनुभव इखट्टा करने की सबसे बड़ी आवश्यकता है प्रयोग करना, परिक्षण करना, प्रयास करना। और सामाजिक ज्ञान के लिए अनुभव सबसे बड़ी पूंजी है। और अनुभव कभी अपने कम्फर्ट जोन में छुपे रहने से नहीं आता। मैं आपको यह बात समझने में परिपक्व मानता हु और यह भी मानता हु की अब आप अपने ओवरप्रोटेक्टीव व्यवहार के दीर्घकालीन परिणाम भी समझते होंगे। ओवरप्रोटेक्टिव रहना किसी भी तरीके से आपके और आपकी संतान के लिए फ़ायदेमंद नहीं साबित हो सकता।

अब ज़रा वापस से मेरे पतंग वाले उद्धरण पे फोकस कीजिये। आपकी संतान उस पतंग के भाति है। जिस प्रकार एक पतंग अपनी बाधाओं, जैसे बाकि पतंगो का सामना अपने मज़बूत मांझे के बल पे कर पाती है। उसी प्रकार आपकी संतान रूपी पतंग का मांझा है वो संस्कार, जीवन के मूल, उसूल, और आचरण जो आप उसे देंगे। जिनकी वदौलत वो समाज में चुनौतियों का सामना कर पाएगा, सफलता के ऊंचे आसमान में उड़ पाऐगे। तो एक अभिभावक के रूप में आप अपनी संतान को जीवन के उसूलो का ज्ञान दे, और जीवन के गगन में उचित ढील के साथ छोड़ दे, और आनंद लेकर देखे की आपकी पतंग आखिर कितनीं उचीईं तक जाती है। जिस प्रकार पतंग को उचित कॅल्क्युलेशन्स के साथ ढील दी जाती है उसी प्रकार अपने बच्चों को भी उनका पर्सनल स्पेस दीजिये।

"अपनी परवरिश और आचरण पे विशवास रखें और आपकी संतान आपको कभी निराश नहीं करेगी। ये मेरा वचन है!"

-श्रेयश

 

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