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मोहब्बत वाली ईद!


यूँ तो चाँद और मैं अक्सर देर रात घंटो बातें किया करते थे। लेकिन आज जब मैं मग़रिब की नमाज़ में थी, तब कहीं दूर से आवाज़ आयी.. "चाँद दिख गया मुबारक हो...."। मैं सहसा ही खुश हो गई के चलो बहुत दिन हुए बात किये हुए आज थोड़ा वक़्त गुजारूं साथ में।

कभी उसे निहारूँ, और जब वो दिखे तो मैं नाराज़गी जताऊं। कभी शरमाऊं तो कभी गुस्से में मूंह बनाऊं। कभी उसे कुछ खामोश ख्वाहिशों से रू बरु कराऊँ और कभी खुद उससे झगड़ के रूठ जाऊं।

छत की ओर जाते हुए सीढ़ियों पर दुआओं की फेहरिस्त बनाते हुए मैं आगे बढ़ी जा रही थी। दीदार ए चाँद को मैं मरी जा रही थी।

उसे देख एक खूबसूरत सी मुस्कान मेरे चेहरे पे आई। आंख बंद कर मैंने दुआ मांगी। आंख खोल कर देखा तो चाँद आज कुछ ज़्यादा ही इतरा रहा था। सितारों से घिरा वो मुझसे दूर होता जा रहा था। न मालूम था के ये क्यों हो रहा है? क्या मेरा चाँद मुझसे आज खफा हो रहा है? मैं उससे सवाल करने ही वाली थी... तब उसने मेरे कानों में कुछ कहा और मैं शर्मायी सी वहीँ खड़ी रह गयी। वो बोला तेरी महीने भर की इबादतों का आज तुझे सिला दे रहा हूँ। ईद का तोहफा समझ या समझ इसे ईदी मैं तुझे तेरी बुलंद तक़दीर से मिलाये दे रहा हूँ । अब सवाल है मेरे खुद से के.. मेरी आँखों की कोर में अटका था एक बादल। वो कोई ख्वाहिश थी? ख्वाब था? वहम था या तुम थे?


-इक़रा असद


 

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