Image by Leo Chane

"हमसफ़र"


"चल रही थी मैं अकेली एक लंबे सफर में,

आया सामने एक राहगीर यूं ही डगर में,

आंखों की गहराई ने उसकी मानो डूबा दिया मुझे एक विशाल सागर में,

मन ने फिर सवाल किया,क्या हर्ज़ है अगर ठहर जाऊं इसी मोड़ पे अगर में?

कदम रुक गए,नज़रें झुक गईं और हुआ एहसास लगर का,

भावनाओं और असमंजस की माया ने बुना एक जाल बगर सा,

चाल बदल सी गई मेरी,मुलाकात सफल सी हुई हमारी,

कदम बढ़ने लगे साथ में,जैसे उसके बिना चलना तो कभी सीखा ही नहीं था,

मगर अब किस नगर की ओर जा रहे थे,हमें इसकी खबर नहीं थी,

एक दूसरे में खोए खोए से साथ चल रहे थे हम,

साथ इतना खूसूरत था की साथ चलने की इच्छा हम दोनों में बराबर थी,

चलते चलते मानो लग रहा था अपनी उस मुस्कान से मुलाकात हुई थी मेरी जिससे मैं ही बेखबर थी,

उसकी नज़रों में छुपी कोई तो शायरी थी, जिसे पढ़ने के लिए मैं बड़ी बेसबर थी,

और होती भी क्यों ना?

एक नया किस्सा हुआ करता था उसकी हर बात के हर लफ्ज़ के हर अक्षर और हर स्वर में।

मैं तो बस आंखें मूंद,सपने बुनते हुए आगे बढ़ रही थी क्यूंकि अब मेरे करीब एक रहबर भी तो था,

गिरूंगी अगर तो वो संभाल लेगा मुझे इतना तो उसपर ऐतबार था,

एहसास ऐसा था मानो बंजर ज़मीन को शबर आ मिला था,

एक मोड़ आया जहां से राहें जुदा होती नजर आ रहीं थीं हमारी,

अफसोस आज भी है,ना जाने क्यूं राहें बदल ली हमने,

जब चलने लगी उससे दूर मैं,मेरे नैनों में समंदर समाए हुए थे और शायद वापस लौट आने की इच्छा उसके अंदर भी थी,

पर हम ना रुके,ना मुड़े,बस आगे बढ़ते गए,

अब गंतव्य मेरा मेरे सामने था पर उसे छू लेने की इच्छा मानो गुम सी गई थी,

शायद ये उस फकीर का ही असर था,

बस उसी पल नज़र आगया वो दोबारा मुझे,

उस पल उस मनोहर सूरत को देख जैसे उस पल में मिठास घेवर से भी अधिक होगयी थी,

हम तो नादान थे,और अंजान भी इसलिए शायद समझ ना पाए कि हमारा संबंध तो एक गोल चक्कर के जैसा था,

हम एक दूसरे कि तरफ बढ़ें या एक दूसरे से दूर,

मिलन हम दोनों का तय था,

मंज़िल तो खो चुकी थी अब,मगर शायद अब एक साथ कोई नई मंज़िल ढूंढने का अवसर था,

आगे का रास्ता मुश्किल तो था,

कई पत्थर थे राह में पर हमने ना अगर सोचा ना मगर,

क्यूंकि हर रत्ना को रत्नाकर में देखा जाता है आज़माकर,

हर कठिनाई का सामना हम एक साथ करते हुए,

एक दूजे को निहारते रहते थे हम हर पहर,

मैं जान चुकी थी अब,जब तक ये साथ मयस्सर है, राहें खुद-बा-खुद मुनव्वर होती रहेंगी,

शायद इसीलिए जब आयी एक लहर मुश्किलों की,

मैंने उस राहगीर के सिवा अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया,

आद्याक्षर हुआ था इस सफर का अंबर के नीचे और अब हम एक साथ अंबर के ही तले चल रहे थे,

ऐसा सुकून तो मैंने कभी महसूस ही नहीं किया था,

मंज़िल भी साथ थी अब और वो राहगीर भी,

क्यूंकि अब हम सदा के लिए एक दूजे के हमसफ़र बन चुके थे।"


-आद्या श्रीवास्तव

 

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